बचपन की लीलाएँ, उसी क्रम में जिस क्रम में सुनाई जाती हैं।
एक बालक, जो डरा नहीं।
जन्माष्टमी, दिवाली, गौर पूर्णिमा — हर एक की एक कहानी।