चित्रों वाली कहानी
प्रह्लाद नारद की कथा सुनते हैं
छोटे · 2–6 साल
18 पन्ने
हिरण्यकशिपु की तपस्या के समय देवताओं ने उसकी सेना को हरा दिया। उसकी गर्भवती पत्नी कयाधु बिना रक्षा के रह गई।
कहानी का पूरा पाठ
- हिरण्यकशिपु की तपस्या के समय देवताओं ने उसकी सेना को हरा दिया। उसकी गर्भवती पत्नी कयाधु बिना रक्षा के रह गई।
- राजा इन्द्र कयाधु को ले गए, क्योंकि उन्हें लगा कि उसका बालक खतरनाक असुर बनेगा। डरी हुई माता रोई और दया की प्रार्थना करने लगी।
- रास्ते में महान ऋषि नारद मुनि मिले। उन्होंने तुरंत इन्द्र को रोक दिया।
- नारद ने बताया कि कयाधु के गर्भ में भगवान का शुद्ध भक्त है। वह बालक किसी को हानि नहीं पहुँचाएगा।
- इन्द्र ने संत नारद की बात पर विश्वास किया। उन्होंने आदर से कयाधु की परिक्रमा की और उसे मुक्त कर दिया।
- नारद कयाधु को अपने शांत आश्रम में ले गए। वहाँ वह अपने पति के लौटने तक सुरक्षित रह सकती थी।
- आश्रम में भगवान के पवित्र नाम गाए जाते थे और हर अतिथि की सेवा होती थी। धीरे-धीरे कयाधु का हृदय शांत हो गया।
- कयाधु ने ऋषि से अपने अजन्मे शिशु की रक्षा करने को कहा। नारद ने भरोसा दिलाया कि बालक पर भगवान की विशेष कृपा है।
- नारद हर दिन उसे आत्मा और परम भगवान के विषय में बताते थे। उन्होंने समझाया, “हम यह शरीर नहीं, शाश्वत आत्मा हैं और भगवान सबके हृदय में रहते हैं।”
- नारद ने भगवान की कथा सुनना, उनके नाम गाना और उन्हें याद करना सिखाया। ऐसी सेवा हृदय को शुद्ध करती है और सच्चा सुख देती है।
- कयाधु ने ऋषि की बातें ध्यान से सुनीं। बहुत समय बाद वह उन उपदेशों में से कई भूल गई।
- उसके गर्भ का शिशु भी हर शब्द सुन रहा था। उसने नारद के उपदेशों को गहरी श्रद्धा से स्वीकार किया।
- यह शिशु प्रह्लाद था। जन्म से पहले ही वह परम भगवान को याद करता था।
- नारद ने बताया कि कोई भी इस बालक को हानि नहीं पहुँचा सकेगा। भगवान की कृपा से प्रह्लाद एक महान भक्त बनेगा।
- हिरण्यकशिपु के लौटने पर कयाधु आश्रम से चली गई। उसने कृतज्ञता से नारद मुनि को प्रणाम किया।
- शीघ्र ही सुंदर और शांत बालक प्रह्लाद का जन्म हुआ। उसकी कोमल मुस्कान से माता प्रसन्न होती थी।
- प्रह्लाद बड़ों का सम्मान करता, मित्रों से प्रेम करता और छोटे बच्चों की देखभाल करता था। वह सबके हृदय में परम भगवान को देखता था।
- महल में कोई नहीं समझता था कि उसे इतनी बुद्धि कहाँ से मिली। प्रह्लाद ने नारद से सुनी हर बात अपने हृदय में सँभालकर रखी थी।
माता-पिता के लिए स्रोत
- ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद, श्रीमद्भागवतम् 7.7 — आत्मा और भक्ति पर प्रह्लाद की शिक्षाएँ।
- ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद, भगवद्गीता यथारूप 15.7 — जीव भगवान का सनातन अंश है।
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