चित्रों वाली कहानी
वराहदेव और दो बलवान भाई
छोटे · 2–6 साल
18 पन्ने
हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बड़े होकर विशाल और बहुत शक्तिशाली बने। उनके भारी कदमों से पृथ्वी काँपती थी।
कहानी का पूरा पाठ
- हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बड़े होकर विशाल और बहुत शक्तिशाली बने। उनके भारी कदमों से पृथ्वी काँपती थी।
- हिरण्याक्ष एक बड़ी गदा लेकर हर जगह किसी योद्धा को खोजता था। उसे देखकर बहुत से देवता छिप जाते थे।
- स्वर्ग में कोई युद्ध न मिलने पर हिरण्याक्ष ब्रह्माण्ड के समुद्र में कूद गया। उसके विशाल शरीर के सामने लहरें हटती चली गईं।
- जल के अधिपति वरुण ने उससे युद्ध करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि केवल परम भगवान ही उसके योग्य प्रतिद्वन्द्वी हैं।
- उस समय पृथ्वी गर्भोदक के गहरे जल में डूबी हुई थी। सभी जीवों को भगवान की रक्षा चाहिए थी।
- भगवान ब्रह्मा की नासिका से एक नन्हा वराह प्रकट हुआ। कुछ ही क्षणों में वह विशाल और तेजस्वी रूप बन गया।
- वे भगवान वराहदेव थे, जो भगवान के नित्य दिव्य रूप हैं। ऋषियों और देवताओं ने वैदिक स्तुतियों से उनकी महिमा गाई।
- वराहदेव गहरे जल में उतरे और उन्होंने पृथ्वी को खोज लिया। उन्होंने अपने शक्तिशाली दाँतों पर पृथ्वी को बहुत सावधानी से उठा लिया।
- हिरण्याक्ष ने भगवान को पृथ्वी उठाए देखा। अभिमानी असुर ने उनका उपहास किया और युद्ध की चुनौती दी।
- वराहदेव ने पहले पृथ्वी को सुरक्षित स्थान पर रखा। उन्होंने दिखाया कि सच्ची शक्ति दूसरों को डराने के लिए नहीं, उनकी रक्षा और सहायता के लिए होती है।
- फिर गदाओं से एक महान युद्ध शुरू हुआ। देवता और ऋषि आकाश से उसे देखते रहे।
- भगवान ब्रह्मा ने वराहदेव से अशुभ समय आने से पहले युद्ध समाप्त करने को कहा। भगवान ने मुस्कराकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की।
- हिरण्याक्ष पूरी शक्ति से फिर आगे बढ़ा। वराहदेव ने सरलता से उसे रोककर पराजित कर दिया।
- पृथ्वी फिर अपने उचित स्थान पर शांति से टिक गई। देवताओं ने भगवान पर फूल बरसाए।
- आनंद भरी प्रार्थनाओं के बीच वराहदेव अपने धाम लौट गए। ब्रह्माण्ड हिरण्याक्ष के भय से मुक्त हो गया।
- भाई का समाचार सुनकर हिरण्यकशिपु दुख और क्रोध से भर गया। उसने भगवान विष्णु से बदला लेने का निश्चय किया।
- हिरण्यकशिपु ने अपने अनुयायियों को भगवान की पूजा करने वाले शांत लोगों को परेशान करने का आदेश दिया। अनेक स्थानों पर भय फैल गया।
- असाधारण शक्ति पाने के लिए हिरण्यकशिपु मन्दर पर्वत गया। वहाँ उसने बहुत कठोर तपस्या शुरू की।
माता-पिता के लिए स्रोत
- ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद, श्रीमद्भागवतम् 3.17 — हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का जन्म।
- ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद, श्रीमद्भागवतम् 3.18–19 — भगवान वराहदेव और हिरण्याक्ष (आगे)।
- ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद, श्रीमद्भागवतम् 7.2 — हिरण्यकशिपु का क्रोध और योजना।
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