चित्रों वाली कहानी
दामोदर लीला
3–7 साल
कृष्ण मक्खन की मटकी फोड़कर माँ यशोदा से भाग जाते हैं। माँ उन्हें ओखली से बाँधना चाहती हैं — पर रस्सी हर बार दो उँगल छोटी पड़ जाती है।
कहानी का पूरा पाठ
माँ यशोदा अपनी आरामदायक रसोई में खड़ी होकर मक्खन मथ रही थीं। चारों ओर ताज़े दूध और मलाई की मीठी सुगंध फैली थी। खिड़की के बाहर पक्षी चहचहा रहे थे, और गुनगुनी धूप खिड़की से झाँककर कमरे को कोमल रोशनी से भर रही थी।
जब उन्होंने अपने नटखट नन्हे कृष्ण को आँखें मलते हुए अपनी ओर आते देखा, तो उनका चेहरा प्रेम से खिल उठा। “माँ, मुझे भूख लगी है! मुझे दूध दो!” — कृष्ण ने रुआँसे स्वर में कहा।
मुस्कुराते हुए माँ यशोदा बोलीं: “हाँ-हाँ, मेरे लाल, आओ।” वे बैठ गईं और कृष्ण को दूध पिलाने लगीं। पर अचानक उन्हें चूल्हे पर रखे दूध की गंध आई — वह उबलकर गिरने और जलने लगा था।
“अरे, चूल्हे पर दूध उफन रहा है!” — वे घबराकर बोलीं। कृष्ण को धीरे से गोद से उतारकर माँ यशोदा दूध का बर्तन उतारने चूल्हे की ओर दौड़ीं।
माँ के चले जाने पर कृष्ण को गुस्सा आ गया। उन्होंने तुरंत एक पत्थर उठाया और मक्खन की मटकी फोड़ दी। मक्खन निकालकर वे एक कोने में छिप गए और झूठ-मूठ रोने का नाटक करते हुए खाने लगे।
इसके बाद कृष्ण ताज़ा मक्खन खाने भंडार-घर में गए। पर मक्खन की मटकियाँ छत से बहुत ऊँचे लटकी हुई थीं।
उन तक पहुँचने के लिए वे ओखली पर चढ़ गए। कृष्ण खुद मक्खन खाने लगे और बंदरों को भी बाँटने लगे। हँसते हुए बोले: “खाओ, मेरे दोस्तो, यह गोकुल का सबसे बढ़िया मक्खन है!”
रसोई में लौटकर माँ यशोदा ने दही की टूटी मटकी देखी और ताली बजाई। एक छड़ी उठाकर वे कृष्ण को ढूँढने निकलीं। “अहा, यह ज़रूर मेरे नन्हे नटखट की शरारत है!” — उन्होंने मन में कहा।
भंडार-घर में झाँककर उन्होंने देखा कि कृष्ण बंदरों को मक्खन खिला रहे हैं और खुद भी खा रहे हैं। माँ की आवाज़ सुनकर और उनके हाथ में छड़ी देखकर कृष्ण झट से ओखली से कूदे और भाग निकले। डरे हुए बंदर भी चारों ओर भाग गए। “कृष्ण! तो तुम यहाँ हो!” — माँ ने कड़ाई से पुकारा।
कृष्ण बहुत तेज़ दौड़ रहे थे, और पहले तो माँ यशोदा उन्हें पकड़ ही नहीं पाईं। दौड़ते और रोते हुए कृष्ण पुकार रहे थे: “माँ, मैं फिर ऐसा नहीं करूँगा!”
पर माँ कृष्ण से गहरा प्रेम करती थीं और बहुत दृढ़ थीं, इसलिए आखिरकार उन्होंने उन्हें पकड़ ही लिया।
डरे और रोते हुए कृष्ण समझ गए कि अब शरारत की सज़ा मिलने वाली है। आँसुओं के बीच वे बोले: “माँ, मैं फिर ऐसा नहीं करूँगा!” उन्हें इतना डरा हुआ देखकर माँ यशोदा ने सोचा: “अरे, कृष्ण तो बहुत डर गया है — यह ठीक नहीं। छड़ी फेंक देती हूँ। पर कोई सज़ा तो देनी होगी, ताकि फिर शरारत न करे। हाँ! मुझे एक उपाय सूझा — रस्सी लेकर इसे ओखली से बाँध देती हूँ।”
वे रस्सी लाईं और कृष्ण को उलटी रखी ओखली से बाँधने लगीं, पर रस्सी दो उँगल छोटी पड़ गई। माँ यशोदा ने दूसरी रस्सी लाकर पहली से जोड़ी और फिर कोशिश की — पर रस्सी फिर दो उँगल छोटी रही। उन्होंने एक और रस्सी जोड़ी, पर वह भी दो उँगल छोटी पड़ गई।
“यह कैसे हो रहा है? अरे कृष्ण, तेरा क्या करूँ?” — माँ झुँझलाकर बोलीं। माँ को इतना थका हुआ देखकर कृष्ण के मन में करुणा जागी। उन्होंने सोचा: “मेरी माँ मुझे बाँधने की कितनी कोशिश कर रही है! वह मुझसे इतना प्रेम करती है कि भूल गई है कि मैं भगवान हूँ, जिसे कोई नहीं बाँध सकता। पर उसके प्रेम के बदले मैं उसे खुद को बाँधने दूँगा।”
बहुत मेहनत के बाद आखिरकार माँ यशोदा कृष्ण को ओखली से बाँधने में सफल हो गईं।
उन्हें बाँधकर माँ घर के कामों में लग गईं। अकेले रह गए कृष्ण ने आँगन में खड़े दो विशाल पेड़ों की ओर देखा।
उन्होंने सोचा: “ये पेड़ साधारण नहीं हैं। ये देवता नलकूवर और मणिग्रीव हैं, जो एक शाप भोग रहे हैं।”
“मुझे इन्हें मुक्त करना होगा, क्योंकि मेरे भक्त नारद मुनि ने इन्हें वचन दिया था। मैं अपने भक्तों से बहुत प्रेम करता हूँ, इसलिए इन देवताओं की सहायता करूँगा।”
ओखली से बँधे कृष्ण पेड़ों की ओर बढ़े और पूरी ताक़त से ओखली खींची। ज़ोरदार गड़गड़ाहट के साथ दोनों विशाल पेड़ धरती पर गिर पड़े। उनमें से दो तेजस्वी पुरुष प्रकट हुए — नलकूवर और मणिग्रीव। प्रणाम करते हुए वे बोले: “हे प्रभु, आपकी कृपा के लिए धन्यवाद! आपने हमें मुक्त कर दिया। हम सदा आपके आभारी रहेंगे, भगवान कृष्ण!”
कृष्ण मुस्कुराए और खुशी-खुशी अपने खेलों में लौट गए, मानो कुछ अनोखा हुआ ही न हो। गोकुल में फिर शांति छा गई, और प्रेम से भरा माँ यशोदा का हृदय अपने चंचल और अद्भुत बेटे की लीलाओं से आनंदित होता रहा।
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