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चित्रों वाली कहानी

बाँसुरी वाला नाविक

5–9 साल

20 पन्ने

एक रहस्यमय नाविक गोपियों को मानसी-गंगा पार कराता है — पर कभी उसे भूख लगती है, कभी थकान, और फिर नाव डूबने लगती है। आख़िर वह है कौन?

कहानी का पूरा पाठ

एक दिन गोपियाँ मानसी-गंगा पहुँचीं। वे सिर पर दूध, मक्खन और दही के घड़े उठाए थीं। किनारे पर एक ही पुरानी नाव में एक नाविक बैठा था — एक युवक, जिसके बालों में मोरपंख लगा था।

“अरे नाविक, कितना अच्छा हुआ कि तुम यहाँ हो!” — विशाखा ने उनसे कहा। — “हमें उस पार ले चलो, हमें बहुत ज़रूरी जाना है!” राधारानी ने जोड़ा: “और धन्यवाद के रूप में हम तुम्हें मिठाइयाँ और मक्खन देंगी।”

“ज़रूर, प्यारी कन्याओ, नाव में बैठो, मैं तुम्हें जहाँ जाना है वहाँ पहुँचा दूँगा!” — अनजान नाविक ने उत्तर दिया।

गोपियाँ नाव में बैठ गईं, और नाविक ने चप्पू चलाना शुरू किया। अचानक वह रुक गया। “तुमने चप्पू चलाना क्यों रोक दिया?” — राधारानी ने अचरज से पूछा। “मैं थक गया हूँ और मुझे बहुत भूख लगी है,” — नाविक ने उत्तर दिया। — “जब तक तुम मुझे खाना नहीं खिलाओगी, मैं चप्पू नहीं उठाऊँगा!” “तुम्हें तो बड़ी जल्दी भूख लग गई!” — ललिता ने नाराज़ होकर कहा।

पर जल्द ही राधारानी समझ गईं कि उनके पास कोई चारा नहीं है और उसे खाना खिलाना ही होगा: “क्या करें? हमें आगे तो जाना ही है! ठीक है, हम तुम्हें कुछ खाने को देंगी।”

सब कुछ खा-पीकर नाविक ने नाव में लेटने का फ़ैसला किया: “धन्यवाद, बहुत स्वादिष्ट था! पर मैं थक गया हूँ और थोड़ी देर सोना चाहता हूँ। और जब तक मैं आराम करूँ, तुम मेरी मालिश करो: एक लड़की मेरा बायाँ हाथ दबाए, दूसरी — दायाँ, तीसरी — बायाँ पैर, और चौथी — दायाँ।”

राधारानी को यह अच्छा नहीं लगा: “ठीक है, एक लड़की तुम्हारा बायाँ हाथ पकड़ सकती है, दूसरी — दायाँ, तीसरी तुम्हारा बायाँ पैर पकड़ सकती है, और चौथी — दायाँ। पर अगर तुमने अभी चप्पू चलाना शुरू नहीं किया, तो हम तुम्हें नाव से बाहर फेंक देंगी!” “तुम लोग तो बड़ी ज़िद्दी हो! अच्छा, चलो, आगे चलते हैं,” — नाविक ने बेमन से मान लिया।

वे चलते रहे, चलते रहे, और कुछ देर बाद फिर रुक गए। ललिता नाराज़ हुई: “अब क्या हुआ? फिर से क्या बात है?” “नाव पर बहुत बोझ है! नाव पुरानी है और इसमें पानी रिस रहा है!” — नाविक ने उत्तर दिया।

“अगर तुमने अपने कुछ घड़े नहीं फेंके, तो हम सब डूब जाएँगे!” — नाविक ने सबको डरा दिया।

अपनी जान के डर से घबराई हुई गोपियाँ दही और मक्खन के घड़े पानी में फेंकने लगीं।

“इतना काफ़ी नहीं! नाव अब भी डूब रही है! अपने सोने के गहने भी फेंक दो!” — नाविक ने माँग की। ललिता गुस्से से बोली: “यह कैसे हो सकता है! तुम्हारी छेद वाली नाव की वजह से हम अपने कीमती गहने फेंक दें? कभी नहीं!”

राधारानी ने चारों ओर देखा और कहा: “प्यारी सखी, हम क्या कर सकते हैं? देखो, ललिता, नाव में कितना पानी भर गया है, हम सच में डूब सकती हैं!” दुखी और डरी हुई गोपियों ने जल्दी से अपने गहने उतारे और पानी में फेंक दिए।

पर नाविक घबराता ही रहा: “अरे, मुसीबत, मुसीबत! इतना काफ़ी नहीं! जो कुछ भी है, सब फेंकना होगा! वरना हम मर जाएँगे! अपने कपड़े भी नाव से बाहर फेंक दो!”

ललिता सब समझ गई और सचमुच गुस्से से भर गई: “अगर तुमने अभी चप्पू चलाना शुरू नहीं किया, तो हम तुम्हें इसी पल नाव से बाहर फेंक देंगी!” “चला रहा हूँ, चला रहा हूँ!” — नाविक डर गया और मन ही मन बड़बड़ाया: “ज़रा-सी बात हुई नहीं कि सीधे नाव से बाहर फेंकने की धमकी!” नाविक ने बेमन से चप्पू उठाए और नाव खेने लगा।

जल्द ही आकाश में काले तूफ़ानी बादल छा गए, और झील में बड़ी-बड़ी लहरें उठने लगीं, यहाँ तक कि पानी सचमुच नाव के किनारे से अंदर आने लगा। नाविक ने राधा और उनकी सखियों की आँखों में डर देखा और उनकी घबराहट बढ़ाने के लिए चुपके से नाव हिलाने लगा: “अब लगता है कि हम सच में ख़तरे में हैं!”

अचानक आकाश में बिजली कड़की, और राधारानी इतना डर गईं कि दौड़कर नाविक के गले से लिपट गईं...

उसी पल लहरें शांत हो गईं, बादल जल्दी से छँट गए और चाँद निकल आया। और तब उन्हें समझ आया कि यह नाविक असल में कौन था।

ललिता हैरान रह गई: “राधारानी! तुम किसी नाविक को गले क्यों लगा रही हो? यह तो अजनबी है!” “क्या तुम्हें पक्का पता है?” — राधा ने पूछा। उन्होंने कृष्ण के वस्त्रों के नीचे से बाँसुरी निकाली और सखियों को उनके सिर पर लगा मोरपंख दिखाया।

ललिता ने हैरानी से कहा: “अच्छा, तो यह बात है! वाह कृष्ण, तुमने तो हमें ख़ूब छकाया!” सब दिल खोलकर हँस पड़े।

इसके बाद कृष्ण बहुत देर तक लड़कियों को नाव में बिठाकर मानसी-गंगा पर एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक घुमाते रहे। उन्होंने कृष्ण की महिमा के गीत गाए, हँसी-मज़ाक किया, और पूरी रात उनके सुंदर चेहरों से मुस्कान नहीं हटी।

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