चित्रों वाली कहानी
जब कृष्ण ने मोती उगाए
4–9 साल
गोपियाँ कृष्ण की गायों के लिए मोती नहीं देतीं, तो वे अपने मोती खुद उगाने का फ़ैसला करते हैं। लालच, उदारता और सच्चे चमत्कार की कहानी।
कहानी का पूरा पाठ
गोपियाँ दिवाली के त्योहार की तैयारी कर रही थीं और धागों में मोती पिरो रही थीं। “हम दिवाली मनाने वाले हैं! हमें अपनी गायों को इन सुंदर मोतियों से सजाना है!” — ललिता ने कहा।
मीठी मुस्कान के साथ कृष्ण ने कहा: “प्यारी ग्वालिनो, मुझे थोड़े-से मोती दे दो, ताकि मैं अपनी प्यारी गायों — हासिनी और हारिणी — को सजा सकूँ।”
कृष्ण ने विनती की: “कृपया, थोड़े-से ही सही! मैं तुमसे बड़े प्यार से माँग रहा हूँ!” “नहीं, कृष्ण, हम तुम्हें अपने मोती नहीं दे सकतीं!” — ललिता ने उत्तर दिया।
ललिता ने बड़े गर्व से कहा कि वह देखेगी कि अपने सुंदर मोतियों में से कौन-सा दान कर सकती है। उसने गहनों की डिबिया टटोली और सबसे छोटा और टेढ़ा मनका निकाला: “लो, यह सबसे अनमोल और उत्तम मोती है, तुम्हारी गायों को सजाने के योग्य!”
कृष्ण ने नाराज़ होकर कहा: “ठीक है, ठीक है! मैं अपने मोती खुद उगाऊँगा, और वे हर तरह से तुम्हारे मोतियों से बढ़कर होंगे!”
“तुम अपने मोती उगाओगे? ये सेब या बेर नहीं हैं — ये झाड़ियों और पेड़ों पर नहीं उगते!” गोपियाँ हँसते-हँसते लोटपोट हो गईं।
कृष्ण घर लौटे और माँ यशोदा से मोती माँगे: “माँ, क्या मुझे कुछ मोती मिल सकते हैं? मुझे एक बहुत ज़रूरी काम के लिए चाहिए!” माँ यशोदा ने हैरानी से पूछा: “मोती? तुम्हें उनकी क्या ज़रूरत है?”
कृष्ण ने समझाया: “मैं अपने मोती खुद उगाना चाहता हूँ, ताकि वे गोपियों के मोतियों से अच्छे हों!” माँ यशोदा को ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी: “पर कृष्ण, मोती ज़मीन पर या पेड़ों पर नहीं उगते। वे समुद्र में सीपियों में मिलते हैं।”
“चिंता मत करो, माँ, मैं कर दिखाऊँगा। मेरे मोती खास होंगे। तुम देखना!” — कृष्ण ज़िद करते रहे। “अच्छा, ठीक है, ले लो,” — माँ यशोदा ने कहा। — “बच्चे हमेशा नए-नए खेल सोचते रहते हैं!”
कृष्ण यमुना नदी के किनारे गए और मोतियों को ज़मीन में गाड़ दिया: “मैं इन्हें यहीं गाड़ूँगा। अब इन्हें दूध से सींचना होगा, ताकि ये उग आएँ!”
“अपने मोतियों को सींचने के लिए दूध कहाँ से लाऊँ? हाँ, पता है! मैं गोपियों से माँग लेता हूँ!”
“मुझे अपने मोती सींचने के लिए थोड़ा दूध दे दो!” — कृष्ण ने माँगा। ललिता ने उत्तर दिया: “नहीं, हम तुम्हारी शरारतों के लिए खाने-पीने की चीज़ें नहीं देंगी!”
तब कृष्ण फिर माँ यशोदा के पास लौटे, उनसे दूध लिया और अपने मोतियों को सींचा।
कुछ दिनों बाद, जहाँ कृष्ण ने मोती गाड़े थे, वहाँ नन्हे-नन्हे अंकुर निकल आए। कृष्ण ने चहककर कहा: “माँ, देखो! ये उग रहे हैं! यह तो चमत्कार है!” “यह कैसे हो सकता है?” — माँ यशोदा ने अचरज से कहा।
गोपियाँ भी अंकुर देखने आईं। “ऐसा नहीं हो सकता! ये तो बस खरपतवार हैं, कृष्ण!” — ललिता ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
रात को जब सब सो गए, तो कृष्ण चुपके से अपने मोतियों के पास आए और बाँसुरी पर एक जादुई धुन बजाई। संगीत इतना सुंदर था कि आसपास के सारे पौधे मानो नाचते हुए झूमने लगे।
छोटे-छोटे अंकुर बड़े और बड़े होते गए, और पतली डंडियों पर अद्भुत फूल खिल उठे। उनके भीतर चाँदनी की बूँदों जैसे चमकते मोती उग आए।
अगली सुबह कृष्ण ने मोतियों की फसल काटी और अपनी सारी गायों के लिए गहने बनाए। पर मोती इतने ज़्यादा उगे थे कि उन्होंने मोरों और बंदरों को भी सजा दिया।
यह चमत्कार देखकर गोपियाँ कृष्ण के पास आईं और अपनी गायों के लिए भी मोती माँगे। कृष्ण ने कहा: “मैं तुम्हें कुछ नहीं दूँगा!”
राधारानी को एक उपाय सूझा: “तो हम भी अपने मोती बोएँगी। सखियो, अपने माता-पिता के पास दौड़ो और हमारे पास जितने मोती हैं, सब इकट्ठा करो!”
“हमारे गहने सबसे सुंदर होंगे!” — ललिता सपने देखने लगी। माता-पिता से गहने माँगकर गोपियों ने सारे मोती ज़मीन में बो दिए और उन्हें दूध, दही और घी से सींचने लगीं।
पर हाय, कुछ दिनों बाद गोपियों के यहाँ केवल काँटेदार झाड़ियाँ उगीं! सारी गोपियाँ बहुत दुखी हो गईं। “यह क्या है? हमारे मोती कहाँ गए?! माता-पिता हमें डाँटेंगे!” — ललिता परेशान होकर बोली।
इस डर से कि घर पर मोतियों के गायब होने का पता चल जाएगा और डाँट पड़ेगी, गोपियों ने एक लड़की को सोना देकर कृष्ण से मोती ख़रीदने भेजा। “कृष्ण, हम तुमसे कुछ मोती ख़रीदना चाहती हैं। चलो, सौदा करते हैं!” — उसने कहा। कृष्ण ने हँसकर उत्तर दिया: “मेरा सबसे छोटा मोती भी भगवान नारायण के वक्ष पर सजे कौस्तुभ मणि से अधिक मूल्यवान है। जिसे मोती चाहिए, वह स्वयं आए!”
सारी गोपियाँ आ गईं, केवल राधारानी नहीं आईं — वे पेड़ों के पीछे छिपकर बातें सुनती रहीं।
“कृष्ण, हमें मोती बेचो!” — गोपियों ने विनती की। कृष्ण ने सबसे छोटा मोती निकाला और उनकी ओर बढ़ा दिया।
“हमें पता है कि तुम्हारे पास इससे सुंदर और अच्छे मोती हैं, वही हमें बेचो!” — गोपियों ने विनती की। कृष्ण और उनके मित्रों ने लड़कियों के सामने इंद्रधनुषी रंगों के चमकते मोती बिछा दिए और दाम बताने लगे: “इस मोती का दाम पूरा एक घड़ा सोना है!” “यह वाला? इसके लिए तो एक सिक्का भी बहुत है!” गोपियाँ कृष्ण से रूठकर चली गईं।
कृष्ण लड़कियों को थोड़ा चिढ़ाना चाहते थे और सबक सिखाना चाहते थे कि उन्होंने उनके साथ मोती नहीं बाँटे। वे यह भी चाहते थे कि राधा स्वयं उनके पास मोती लेने आएँ। पर गोपियों को सिर झुकाए जाते देखकर वे सह न सके। उन्होंने अपने हाथों से सबसे अच्छे मोतियों के हार पिरोए और उन्हें उपहार में भेज दिया।
उपहारों को निहारते हुए गोपियाँ कहने लगीं कि कृष्ण ने उन्हें कितने सुंदर हार भेजे हैं, और मोती इतने शानदार हैं और इतनी मोहक चमक से झिलमिला रहे हैं कि अब घर पर कोई उन्हें नहीं डाँटेगा।
“और यह अद्भुत सोने की डिबिया क्या है?” — राधारानी ने पूछा। ललिता ने ढक्कन पर लिखा पढ़ा और बोली: “इस पर लिखा है ‘रा-धि-के’। राधा, यह तुम्हारे लिए है!”
राधारानी ने डिबिया खोली और उसमें से अद्भुत सुंदरता का एक हार निकाला, जिसमें और भी सुंदर मोती जड़े थे।
खुशी से भरकर उन्होंने कहा कि कृष्ण कितने अद्भुत हैं — उन्होंने उन्हें मुसीबत से बचा लिया और इतना खुश कर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि बदले में कृष्ण को एक प्यारा-सा आश्चर्य दिया जाए। लड़कियों ने स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाईं, जंगली फूलों की सुगंधित मालाएँ गूँथीं, सब कुछ सुंदर टोकरियों में सजाया, नए हार पहने और अपने उपहार कृष्ण के पास ले गईं।
उन्होंने कृष्ण को मालाएँ पहनाईं, मिठाइयाँ खिलाईं, और फिर सब मिलकर अपने हृदय के स्वामी का गुणगान करते हुए गाने और नाचने लगे।
इसी श्रृंखला से और
इस कहानी का अभिनय करें
इस कहानी के पात्र हमारे सेट में मूर्तियों के रूप में हैं।
सेट देखेंपुस्तकालय इसी से चलता है। सुनते रहने के लिए कुछ भी ख़रीदना ज़रूरी नहीं।
हर हफ़्ते एक नई कहानी
एक छोटा पत्र, एक नई कहानी। एक क्लिक में सदस्यता छोड़ें।
केवल माता-पिता का पता। बच्चों से हम कुछ नहीं पूछते।