चित्रों वाली कहानी
फल बेचने वाली
2–7 साल
19 पन्ने
कृष्ण फल ख़रीदना चाहते हैं, पर मटकियों में मक्खन नहीं बचा, तो वे फल बेचने वाली के लिए नन्ही हथेलियों में अनाज भर लाते हैं। वह स्त्री उन्हें अपने सारे फल दे देती है, और उसकी टोकरी रत्नों से भर जाती है।
कहानी का पूरा पाठ
एक सुबह वृंदावन में नंद महाराज के घर के पास एक फल बेचने वाली आई और उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई: “फल ले लो, फल! फल ले लो!”
उसकी आवाज़ सुनते ही कृष्ण उछलकर उठे और ढूँढने लगे कि फलों के दाम में क्या दें। वे मक्खन की मटकियों की ओर दौड़े, पर मटकियाँ तो खाली थीं।
“लगता है, माँ ने मक्खन से घी बना लिया, और नया मक्खन अभी मथा नहीं गया,” — नन्हे कृष्ण उदास होकर बोले।
पास ही अनाज की बोरियाँ रखी थीं। कृष्ण दौड़कर वहाँ गए और अपनी नन्ही हथेलियों में जितना अनाज समा सका, उतना भर लाए। फिर वे इसी चावल से फलवाली को फलों का दाम चुकाने बाहर गली में दौड़ पड़े।
कृष्ण ने मुस्कुराकर उस स्त्री की ओर अपनी हथेलियाँ बढ़ाईं, जिनमें अब थोड़ा-सा ही अनाज बचा था। फलवाली ने कृष्ण को स्नेह से देखा और कहा: “कितना प्यारा बच्चा है! तुम तो मेरे सबसे मीठे आमों से भी मीठे हो!”
“इन्हें चखने का मेरा कितना मन है!” — कृष्ण ने उत्तर दिया। स्त्री मुस्कुराई और बोली: “अपने नन्हे हाथ आगे करो! ये लो मीठे आम, रसीली पीली नाशपातियाँ, पके अंगूर, रोएँदार आड़ू और सुगंधित संतरे!”
फलवाली ने कृष्ण को उतने फल दे दिए, जितने वे उठा सकते थे। उसी पल उसकी टोकरी रत्नों और सोने से भर गई।
घर के अंदर जाकर जब उसने अपनी टोकरी में झाँका, तो दंग रह गई। “यह क्या है? मेरी टोकरी तो सुंदर रत्नों से भरी है!” — उसने कहा।
स्त्री ने यह चमत्कार दिखाने के लिए अपने पूरे परिवार को बुलाया। “अजी, सुनते हो! बिटिया! जल्दी यहाँ आओ और देखो, मेरे पास क्या है!”
सबसे पहले बेटी दौड़ी आई और रत्न देखकर बोली: “माँ! ये कितने सुंदर हैं!” “हाँ, बिटिया, पर वह नन्हा बालक इनसे कई गुना सुंदर था!” — फलवाली नन्हे कृष्ण को याद करते हुए बोली।
पति ने इतने धन से भरी टोकरी देखी, तो दंग रह गया: “तुम्हारे पास इतने रत्न कहाँ से आए? सारी ज़िंदगी हम इतने ग़रीब रहे... और अब अमीर हो गए!”
पर फलवाली को अब अपने पति की बात सुनाई ही नहीं दे रही थी। वह कृष्ण को याद करने लगी थी। “ओह, कितना सुंदर है वह प्यारा-सा बालक!” — वह बस यही दोहराती रही।
इस बीच कृष्ण भरे हाथों से खुशी-खुशी घर लौट आए। वे माँ यशोदा के पास गए और उन्हें दिखाने लगे कि क्या ख़रीदकर लाए हैं। यशोदा ने पूछा: “कृष्ण, ये फल तुम्हें कहाँ से मिले?” “एक मौसी लाई थीं, उन्होंने दानों के बदले मुझे दे दिए,” — कृष्ण ने उत्तर दिया।
यशोदा ने स्नेह से कहा: “तुम तो कितने बड़े हो गए हो! खुद ही सौदा किया और खुद ही फल उठा लाए!” माँ ने तारीफ़ की, तो कृष्ण को बहुत अच्छा लगा।
“माँ! चलो, पिताजी को, बलराम को और सबको, सबको, सबको बुलाएँ और उन्हें ये अद्भुत फल खिलाएँ!” — कृष्ण ने सुझाव दिया। “हाँ, ज़रूर! जाओ, सबको बुला लाओ, तब तक मैं सब कुछ तैयार करती हूँ,” — यशोदा ने उत्तर दिया।
पूरा बड़ा, हिला-मिला परिवार एक साथ खाने बैठा: माँ यशोदा, पिता नंद महाराज, भाई बलराम और बलराम की माँ रोहिणी।
सब खुश थे और स्वाद ले-लेकर खा रहे थे। पर वे चाहे जितना खाते, फल ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते थे।
“कमाल है!” — यशोदा हैरान होकर बोलीं। — “मैं इतने फल बाँट चुकी हूँ, पर थाल अब भी भरा हुआ है! यह कैसे हो सकता है?”
उन्होंने अचरज से अपने बेटे की ओर देखा, और कृष्ण मज़े से बैठे, शरारत से मुस्कुराते हुए दोनों गाल भर-भरकर खा रहे थे!
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