चित्रों वाली कहानी
नन्हे कृष्ण के खेल
2–7 साल
16 पन्ने
पड़ोस की गोपियाँ माँ यशोदा से मिलने आती हैं, नन्हे कृष्ण को पहियों वाली लकड़ी की गाय भेंट करती हैं, उनके साथ लुका-छिपी खेलती हैं और उनसे नाचने को कहती हैं। और शाम को कृष्ण ज़िद पकड़ लेते हैं कि उन्हें आसमान से चाँद उतारकर दिया जाए, जो बिल्कुल गोल लड्डू जैसा दिखता है।
कहानी का पूरा पाठ
नन्हे कृष्ण बड़े हो रहे थे, और उन्हें देखकर माँ यशोदा और पिता नंद फूले नहीं समाते थे। पड़ोस की गोपियाँ उन्हें अपने ही बेटे की तरह प्यार करती थीं और अक्सर नन्हे-मुन्ने के साथ खेलने उनके घर आ जाती थीं। “देखो तो, कितना प्यारा बालक है! देखते ही मन खिल उठता है!” — वे कहती थीं।
एक दिन एक गोपी कृष्ण के लिए उपहार लेकर आई। “देखो, मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ!” वह पहियों वाली लकड़ी की एक छोटी-सी गाय थी। कृष्ण ताली बजाने लगे: “क्या मैं इसे चला सकता हूँ?”
“पकड़ो! सर्र-र-र!” — और गाय लुढ़कती हुई सीधे उनके पास आ गई। कृष्ण ने हँसते हुए उसे पकड़ा और वापस धकेल दिया: “सर्र-र-र! चली तुम्हारे पास! वाह, क्या खिलौना है!”
“चलो, लुका-छिपी खेलें!” — गोपी ने कहा। — “एक, दो, तीन, चार, पाँच — अब मैं तुम्हें ढूँढने आ रही हूँ!” कृष्ण माँ के आँचल के पीछे छिप गए और दबी-दबी हँसी हँसने लगे: “खी-खी-खी!”
“अहा, तो तुम यहाँ हो!” — गोपी खुश होकर बोली। — “अगली बार और अच्छी तरह छिपना!” “फिर से, फिर से, फिर से!” — कृष्ण मचल उठे।
इस बार कृष्ण और भी दूर भागे और एक पेड़ के पीछे जा छिपे। गोपी ने हर जगह ढूँढा: “यहाँ भी नहीं है, वहाँ भी नहीं है... अरे, तो तुम यहाँ हो! बड़ी मुश्किल से ढूँढ पाई!”
“कितना समझदार बच्चा है! ज़रूर यह ताक़तवर भी होगा। कृष्ण, ज़रा वह टोकरी तो ले आओ!” कृष्ण दौड़कर गए और टोकरी को बाँहों में भरकर आगे-आगे घसीटते हुए ले चले। “ऊ-ऊ-ऊह! ओ-ओ-ओह!” — वे ज़ोर लगाते रहे, पर टोकरी पहुँचाकर ही माने।
“और मेरे लिए छोटी-सी चौकी ले आओ, हँसते-हँसते मैं तो अभी गिर पड़ूँगी!” कृष्ण चौकी भी ले आए और फिर अपनी नन्ही बाँहें थपथपाने लगे: देखो, मैं कितना ताक़तवर हूँ! “तुम्हारी बाँहों में कितनी ताक़त है!” — गोपी ने हैरान होकर कहा।
तब कृष्ण माँ की मदद करने मक्खन की मटकियों की ओर दौड़े। वे कभी मटकी के चारों ओर घूमते, कभी उकड़ूँ बैठ जाते, कभी नन्हे पैर से उसे धकेलते। पर मटकी उठती ही नहीं! “उफ़! नहीं हो रहा,” — नन्हे कृष्ण आह भरकर बोले, फिर गोपी की ओर देखकर खुद ही हँस पड़े।
फिर वे नन्हे हाथ ऊपर उठाकर गोपी के चारों ओर गोल-गोल दौड़ने लगे। “यह बच्चा तो बिजली की तरह दौड़ता है!” “मेरा तो सिर चकराने लगा!” “कहीं इसी का सिर न चकरा जाए!” — यशोदा ने कहा।
और तभी कृष्ण ठोकर खाकर गिर पड़े। “माँ!” — वे रो पड़े और नन्ही मुट्ठियों से आँखें मलने लगे। यशोदा ने बेटे को झट से गोद में उठा लिया: “आओ, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें पुचकार दूँ।”
शाम हुई, आसमान में गोल-गोल चाँद निकल आया। कृष्ण ने नन्ही उँगली से उसकी ओर इशारा किया: “माँ, मुझे वह लड्डू चाहिए!” “मेरे लाल, वह तो चाँद है, उसे कोई नहीं उतार सकता!” “पर मुझे तो चाहिए! चाहिए, चाहिए, चाहिए!”
“अगर चाँद को आसमान से उतार लिया, तो अँधेरा हो जाएगा, और जंगल के जानवर अपने घर का रास्ता नहीं ढूँढ पाएँगे,” — गोपियाँ मनाने लगीं। तब माँ ने कृष्ण को थोड़ा-सा मक्खन दिया। “म्म्म, कितना स्वादिष्ट है!” — कृष्ण ने कहा और अपने नन्हे पेट पर हाथ फेरा।
“अच्छा, हमारे लिए नाचो, तो पूरी एक मिठाई मिलेगी!” पहले तो कृष्ण शरमा गए, पर जब गोपियाँ गाने और ताली बजाने लगीं, तो उनसे रहा न गया — वे नन्हे हाथ-पैर मज़ेदार ढंग से हिलाते हुए ठुमक-ठुमककर नाचने लगे। “ऐसे ही! ऐसे ही! वाह, शाबाश!”
गोपियों ने कृष्ण को एक मिठाई नहीं, बल्कि मिठाइयों से भरी पूरी टोकरी दे दी। कृष्ण दोनों गालों में एक साथ मिठाइयाँ ठूँसकर मुस्कुरा उठे: “कित्ता फ़्वादिफ़्ट! माँ, तुम्हाली फ़हेलियाँ कल भी आएँ!”
तभी बड़े भाई बलराम आ गए। “अरे, तुमने सारी मिठाइयाँ मेरे बिना ही खा लीं? तो मैं तुम्हारे सोने के सिक्के ले लूँगा!” “मत लो, ये मेरे हैं!” — कृष्ण सिक्कों को नन्ही मुट्ठी में भींचकर भाग खड़े हुए, और बलराम हँसते हुए उनके पीछे-पीछे। गोकुल में दिन ऐसे ही बीतते थे — हँसी, भाग-दौड़ और प्रेम में।
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