चित्रों वाली कहानी
जब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया
2–4 साल
10 पन्ने
स्वर्ग के राजा इंद्र ग्वालों पर क्रोधित हो गए और उन्होंने वृंदावन पर मूसलाधार बारिश बरसा दी। सात साल के कृष्ण ने पूरा पर्वत एक हाथ पर उठा लिया और सात दिन तक उसे गाँव के ऊपर छाते की तरह थामे रखा।
कहानी का पूरा पाठ
यह वृंदावन है। हरा-भरा मैदान, छोटी-सी नदी, गायें। “म्बाँ-आँ!” — गायें नमस्ते कर रही हैं। यहाँ कृष्ण रहते हैं। वे नन्हे ग्वाले हैं।
आज त्योहार है! माँओं ने रोटियों और खीर का बड़ा-सा पहाड़ बनाया है। म्म्म, कितनी अच्छी खुशबू आ रही है!
अचानक बादल आ गए। बड़े-बड़े! बहुत बड़े! अँधेरा हो गया।
टप। टप-टप। टप-टप-टप! झमाझम बारिश होने लगी। गायें भीग गईं। बछड़े अपनी माँओं से सट गए।
“कृष्ण! कृष्ण!” — सब पुकार रहे हैं। — “हमें ठंड लग रही है, हम भीग गए हैं!”
और कृष्ण ने पहाड़ उठा लिया। एक हाथ से! बड़ा-सा, बहुत बड़ा पहाड़ — छाते जैसा।
सब पहाड़ के नीचे छिप गए। माँ यशोदा भी। गायें भी। बछड़े भी। पहाड़ के नीचे सूखा-सूखा और गरम-गरम है।
और फिर बारिश रुक गई। सूरज दादा निकल आए! और इंद्रधनुष भी।
सब कृष्ण को गले लगाते हैं: “धन्यवाद, कृष्ण!” और आसमान से फूल बरस रहे हैं।
अब तुम्हारी बारी। एक तकिया रखो — यह रहा पहाड़। उसके नीचे गायें खड़ी कर दो। पहाड़ के नीचे कौन छिपेगा? थामे रखो, कृष्ण!
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